क्या करें जब कोई अपना ही हो मन का दंश ?

क्या करें जब कोई अपना ही हो मन का दंश ?

December 10, 2018 0 By Dr.Gunjarika Ranka

‘घर’ दुनिया की सबसे प्यारी जगह ! ‘परिवार’ सबसे सुरक्षित माहौल का नाम ! पर कभी-कभी यही वह जगह बन जाती हैं जहाँ आपका मन सबसे ज्यादा दर्द से गुजरता हैं। जहां से स्नेह, भरोसे का अमृत मिलना चाहिए वहीँ किसी से विषैला व्यवहार मिल रहा होता हैं।

दोस्त, पड़ौसी या किसी दूर के रिश्तेदार के साथ रिश्ते में कड़वाहट हो तो कैसे सामना करें इसके बहुत तरीके हो सकते हैं पर जब कोई नितांत अपना ही मन का दंश बन जाये तो क्या करें ? जब बातें इतनी बड़ी न हों की सम्बन्ध समाप्त कर लिए जाये लेकिन हर पल होने वाली, दिखने में छोटी लगने वाली ये विषैली बातें…  धीमा जहर बन कर मन का उत्साह और सुकून सोख रही हो, तब कैसे हो निर्वाह ? अपमान, एहसान, ग्लानि, से जूझते असमंजस भरे मन का दर्द कैसे कम हो ?

सबसे पहले और सबसे महवपूर्ण बात ये समझना और स्वीकार करना हैं की जरूरी नहीं हैं कि सबको ऐसा परिवार मिलें जिस पर वे ‘निर्भर’ रह सकें, जहाँ उनकी पुकार को सुना जाये या जहाँ से बिना शर्त प्रेम मिलेगा ही ! बहुत बार परिवार के सदस्य सिर्फ एक ‘साथ रहते’ है ‘साथ होते’ नहीं। परिवार में कुछ लोग हमें मजबूत बनने में सहायक होते है तो कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो हमें तोड़ के रख दें। 

दूसरी बात जो आपको समझनी हैं वो ये कि, हो सकता हैं परिवार का वह कड़वा सदस्य स्वयं किसी मुश्किल दौर से गुज़र रहा हो-  कोई बिमारी, कोई गहरी चिंता, खुद उसके जीवन में प्रेम का अभाव ( हो सकता हैं अब या हो सकता हैं बचपन में वे प्रेम से वंचित रहे हो और स्वयं उन्हें परिवार में विषाक्त वातावरण मिला हों) . हालाँकि कारण चाहे जो भी हो पर इनके आज के व्यवहार से आपको अपना बचाव तो करना ही हैं।

आपका रिश्ता उस व्यक्ति से क्या हैं उस हिसाब से उनसे निर्वाह के तरीके तय करने होंगे पर फिर भी कुछ ऐसे मुख्य तरीके हैं जिन्हे आप हर जगह काम में ले सकते हैं –

1. हो सकता हैं वे ‘दिल के बुरे’ ना हों, पर वे वह व्यक्ति भी नहीं हैं जिसके साथ आपको हर रोज समय बिताना चाहिए- बुरा व्यवहार करने वाला व्यक्ति अक्सर ये सब बिना सोचे समझे करता हैं। आपको पीड़ा देते समय भी पीड़ा देने की उनकी कोई ‘योंजना’ नहीं होती। उनके जीवन शैली ऐसी होती हैं जिसके तहत वे आप पर दबाव बनाते हैं की आप अपनी जरूरतों को, अपनी इच्छाओं को, उनकी सुविधा के अनुसार बदल लें। ऐसे व्यक्ति के लिए उसकी अपनी छोटी से छोटी ‘सुविधा’ भी दूसरे की ख़ुशी, प्रगति हर चीज से बड़ी  होती हैं। वे आपको हर समय अपनी सुविधा के अनुसार आचरण करते हुए देखना चाहते हैं। ऐसे में बहुत जरूरी हो जाता हैं की आप उनसे थोड़ी दूरी बढ़ाये ताकि आपको अपने लिए भी पर्याप्त जगह (space) मिल सकें। आप हर रोज अपने आप को किसी के मूड (mood) के हिसाब से जीनें के लिए नहीं छोड़ सकते ! हर हाल में आपको अपना स्वास्थ्य (शारीरिक और मानसिक दोनों) को बनाये रखना चाहिए।

उनके आस पास मत रहिये, उनके साथ बैठना बहुत कम कर दीजिये, कुछ ऐसे काम शुरू कर लीजिये जिस से आपको दिन के कुछ घंटे उनसे दूर रहने का मौका मिलें। ये अपने आपको मानसिक रूप से रिफ्रेश (refresh) करने के लिए जरूरी हैं। स्थिति कितनी विकट हैं इस आधार पर अपने लिए कोई भी निर्णय लेने का आपको पूरा अधिकार हैं।

2. विषैले लोग अक्सर अपना क्रोध कह कर ज़ाहिर नहीं करते बल्कि बड़ी चतुराई से अपने हाव भाव से माहौल को तनावपूर्ण बना कर दर्शाते हैं –

वे अपनी बात सीधे नहीं कहेंगे  बल्कि आपको तीखी नज़रों से देखेंगे, पूछने पर व्यंग्यात्मक उत्तर देंगे। वास्तव में इन्हे ये लगता हैं की बात करने पर, तर्क कर सकने योग्य, कारण इनके पास नहीं हैं क्योकिं मूल में तो होती हैं इनकी अपनी निहायत मामूली सी असुविधा जिसका जिक्र करना इनके अहम् को गवारां नहीं होता। क्योंकि इन्हे भय होता है की लोग उसे ख़ारिज ही न कर दें। इसलिए ये चाहते है की सामने वाला खुद इनकी उस असुविधा को ‘बड़ी बात’ का दर्जा दे। 

इसलिए वे आपको अपनी नाराज़गी का कारण नहीं बताएँगे बल्कि अपने हाव-भाव से आपको तब तक प्रताड़ित करते रहेंगे जब तक आप स्वयं ये नहीं सोच लेते की आज इनकी कौनसी सुविधा में खलल पड़ा हैं या कौनसा कार्य आपने इनके मापदंडों के हिसाब से ‘ठीक से’ नहीं किया है। फिर जब आप इनके सामने ‘उस बात’ का उल्लेख करेंगे तो ये कहेंगे की आपको सब पता हैं और ये सब आपने इन्हे पीड़ा देने के उद्देश्य से ही किया हैं।

ये वाकई में एक विषैली स्थिति हैं ! इसका अर्थ ये हैं की वह व्यक्ति आपसे खुल कर अपनी बात इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि उसे लगता है की आपकी दृष्टि में उसकी बात का महत्व नहीं होगा। ऐसे में आप उसे प्रेम से यह समझाए की उसकी हर भावना का आप सम्मान करते हैं और आपके जिस कार्य से उन्हें असुविधा हुई हैं वह आपके लिए क्यों महवपूर्ण हैं। उन्हें चर्चा (discussion) के लिए प्रेरित कीजिये कि इस परिस्थिति में भविष्य में कैसे काम करना हैं जिससे आप दोनों को ही परेशानी न हों। यदि वे आपके प्रस्ताव पर सहमत होते है तो आप दोनों कोई बीच का रास्ता निकालिये और यदि वे अपने “अति-दुखी वाले मूड’ के बदले 100 % बलिदान आप से ही चाहते हैं व ताना मारते हुए आपको स्वीकृती देते हैं तो संभल जाइये और point 1.में जो विकल्प थे वही चुनिए।

3. वे आप पर धौंस जमा कर रखना चाहते हैं –

स्कूल कॉलेज में धौंस ज़माने वाले (bully) लोगो के बारे में हम सुनते रहते हैं। पर ये समस्या बहुत विकट हो सकती हैं अगर ऐसा घर में होने लगे। कहीं भी होता हो, ‘गलत’ हमेशा ‘गलत’ ही होता हैं। इस दुनियां में किसी को भी ये इजाजत नहीं मिल सकती की वह दूसरे के स्वाभिमान पर आघात करें ! पर कुछ लोग होते हैं जिन्हें दूसरों को नीचे झुकाने में ही सुख मिलता हैं। उन्हें स्वयं की श्रेष्ठता सामने वाले के स्वाभिमान को कुचल कर ही अनुभव होती हैं। ऐसे में आपको क्या करना हैं ? अपना साथ दीजिये ! खुद के लिए खड़े होइए। उनके अहंकार के बहाव के लिए खुला रास्ता मत बनिए। याद रखिये आपके स्वाभिमान को कुचलने की शक्ति तब तक किसी को नहीं मिलती जब तक आप स्वयं उसे ना सौंप दें ! अपने शत्रुओं का सामना करने के लिए बहुत साहस चाहिए होता हैं और उस से अधिक साहस चाहिए होता हैं अपने इन विषैले स्वजनों का सामना करने के लिए। कई बार ये व्यवहार बहुत ही अनअपेक्षित संबंधों की और से आता हैं, परखिये की आपके सबसे निकट के व्यक्ति आपके साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं, ध्यान दीजिये उन छोटी छोटी बातों पर जहां सहयोग की जगह वे तानें देना चुनते हैं ! जहाँ भी जरूरी लगे वहीँ रोकिये, टोकिये उन्हें। बताइये की आपकी जरूरतें क्या हैं और परिजनों से आपकी अपेक्षाएं क्या हैं। उनकी जरूरतों और अपेक्षाओं के बारे में उनसे पूछिए। पहली बार जब कोई व्यंग्य कसे या हाव् भाव से दुर्व्यवहार दर्शाये तभी इसे चर्चा का विषय बना लीजिये। यदि वे जायज (genuine) होंगे तो आपके साथ सार्थक चर्चा करेंगे और यदि उनका उद्देश्य सिर्फ आपको उँगलियों पर नचाना ही है तो वे इस पर बातचीत को टालेंगे और भविष्य में उसी व्यवहार को दोहराएंगे – तो आप संभल जाइये और point 1. में बताये गए विकल्पों को अमल में लाइए। याद रहें किसी की भी ‘तबियत खुश’ रखने के लिए आपको खुद को मिटाना नहीं हैं !

4. प्रताड़ित हो कर भी विषैले व्यवहार के आगे स्वयं को ‘सामान्य दिखाना’ गलत हैं –

अक्सर घर में शांति बनाये रखने के लिए हम ऐसे व्यवहार का विरोध नहीं करते पर इसका नतीजा हमारे लिए और भी बुरी स्थितियां ले आता हैं, क्योंकि अब वह व्यक्ति ये जान जाता हैं की उसके चिड़चिड़े बर्ताव के चलते कोई उनके मुँह नहीं लगेगा और वो जैसा चाहे वैसा करने के लिए आपको बाध्य कर सकते हैं। आपकी चुप्पी ऐसे लोगों को और शै देती हैं। ये अपनी जकड़न आपके चारों और बढ़ाते जायेंगे क्योंकि इन्हे लगता रहेगा की ये तो आपसे कुछ ज्यादा मांग ही नहीं रहे बल्कि आप ही हैं जो इनकी जायज बातों को नहीं समझ रहें हैं। इस लगातार बढ़ती जकड़न में घुट के ख़त्म होने लगेंगे आप क्योंकी हर रोज हर बात में ये सब झेलना आत्मघाती हैं। बेहतर है की घर की ‘उस पल की शांति’ को चुनने की जगह उस व्यवहार को निश्चित करवाएं जिसके साथ आप हर रोज जी सकें। आप मेहमान नहीं हैं जिसे दो दिन बर्दाश्त कर के चले जाना हो, इस घर में आपको जीवन बिताना हैं। आपके परिवार का कोई भी सदस्य जिसकी आयु 21 वर्ष से अधिक है और वह औरों का सम्मान करना नहीं जानता, अपनी बात तार्किक तरह से न कह कर व्यंग्यात्मक शैली रखता है, धौंस जमाता हैं, तो उसके ऐसे व्यवहार को कदापि हल्के में न लें उसका विरोध पहले बार में ही करें।

5. वो आपकी उपेक्षा करते हैं इसलिए आपको भी अपनी उपेक्षा नहीं करनी हैं – अपना ख़याल रखिये… हर रोज !

वाकई में, अगर आप किसी भी कारणवश बाध्य है ऐसे विषैले व्यक्ति के साथ रहने के लिए तो बहुत जरूरी हैं की आप अपने लिए पर्याप्त एकांत समय निकालें जिसमें आप आराम कर सकें और रिफ्रेश हो सकें। एक विषैले व्यक्ति के साथ एक जिम्मेदार और समझदार व्यक्ति की भूमिका निभाना बहुत थका देता हैं आपको। और अगर आपने अपना ख़याल नहीं रखा तो ये विष धीरे धीरे आपमें घर करता जायेगा और कब आप उन जैसे ही हो जायेंगे आपको पता भी नहीं चलेगा !

विषैले परिजन का 24 घंटे का साथ आपकी ऐसी मानसिक स्थिति कर देता हैं की आपको स्वयं पर ही शक होने लगता हैं.. कितनी राते आपकी नींद ये सोचते हुए उड़ जाती है की कहीं आप ही तो गलत नहीं कर रहें, कहीं आप ही को जिम्मेदारियां निभानी नहीं आती, आप ही को दूसरों की जरूरतों को समझना नहीं आता, आप स्वार्थी हैं, आप ही है जिसमें धैर्य की कमी हैं। ये बाते दिन में कई-कई बार वो जतलायेंगे और रातों को यही ख़याल आपको जगायेंगे और ये रोज होगा हफ़्तों…  महीनों… सालों तक ! बहुत बार ऐसी विषैले व्यक्ति का उद्देश्य यही होता हैं की वह आपकी मानसिक स्थिति उसके जैसी ही कर दे ताकि जब आप अपना संतुलन खोएं तो वह आपको ही  ‘समस्या की जड़’ घोषित कर सकें। जब तक आप तार्किक रूप से सही हैं तब तक वो ये नहीं कर पाते पर जैसे ही आपने अपना संतुलन खोया अब उन्हें मौका मिल जाता हैं और वे ये घोषित करने लगते हैं की यही आपका ‘असली रूप’ है जो आपने छुपा रखा था और जिसका उन्हें हमेशा से पता था। ये बहुत बहुत बहुत खतरनाक स्थिति हैं ! हो सकता है आप में से कुछ लोग इस स्थिति से गुज़र रहें हो, हो सकता है की अभी यहाँ तक नहीं पहुंचें हो, दोनों ही स्थितिओं में अभी ! यहीं रुक जाइये ! सबसे पहले अपने आप को इनसे कुछ समय के लिए दूर कर लीजिये।  ये आपके अंदर से, आप ही को, काफी हद तक ‘मिटा चुके हैं’ ! दूरी बनाइये इनसे, अलग नहीं जा सकते तो घर में रहकर बनाइये। इस समय आपकी सबसे ज्यादा जरुरत आपको हैं। दिलचस्प बात ये है की ये आपको अपना शत्रु नहीं समझते हैं पर ये लोग अपनी भावनात्मक आवश्यकताओं के आगे कुछ और नहीं देख सकते। अपनी जरूरतों के लिए कैसा भी व्यवहार करना गलत नहीं समझते। अब क्योंकि आप इनके स्वभाव/व्यवहार को नियंत्रित नहीं कर सकते तो बहुत जरुरी है की आप अपना ख्याल रखें। अपने अंदर की ऊर्जा को धूमिल न होने दें। कुछ अच्छा पढ़िए /सुनिए। योग ध्यान प्राणायाम को नियमित रखें। ये चारों अविश्वसनीय रूप से सहायक साबित होते हैं, यकीन कीजिये।

6. विषाक्त व्यवहार को व्यक्तिगत न लें – विषाक्त वे है, आप नहीं !

विषैला व्यक्ति हमेशा यह जतलाने की कोशिश करता हैं की गलती आपकी हैं। और क्योंकि हम में से बहुत लोगो में ग्लानि वाला बटन बहुत एक्टिव होता हैं, हम जल्द ही यह मान लेते हैं की हमने ही उन्हें पीड़ा पहुंचाई हैं। हर रोज किसी न किसी बात पर ग्लानि अनुभव करवा कर वे हमसे हमारी सबसे कीमती चीज छीन लेते हैं — हमारा आत्मविश्वास !

हमें यह लगने लगता हैं हमको कुछ ठीक से करना नहीं आता, हमें ख़याल रखना नहीं आता। रोज उनकी नाराजगी, रोज उन्हें मनाना, रोज उनका ये जतलाना की उन्हें रोज हमारे कारण कितनी परेशानी होती हैं, हफ़्तों महीनों तक यहीं कार्यक्रम और आखिर हम उन्हीं पर निर्भर हो जाते हैं की वही बता दे कब क्या कैसे करना हैं। अब शुरू होता है पार्ट 2 जहाँ वे इसलिए चिड़चिड़ाएंगे की आप कितने नाकाबिल हैं ! आप उनके दिए लेबल खुद पर लगाते चले जायेंगे और यकीन मानिये वे कभी नहीं थकेंगे ! मत होने दीजिये ऐसा अपने साथ। इस जकड़न को तोड़िये, बहुत हल्का… बहुत खुला-खुला.. महसूस करेंगे आप अगर आप ये समझ लेंगे की ये सब जो वो कहते है वह ‘उनके दिमाग में हैं’ ‘आप में नहीं हैं’ ; तब भी, जब वो सीधा आप पर आक्षेप लगा रहे हो, जब वे आपको जलील करने के लिए कोई आधार पेश कर रहे हों, रुकिए, सुनिए, परखिये, की क्या वह आधार वाजिब हैं? अगर हैं तो आपको क्या करना चाहिए इस पर विचार कीजिये। पर ये विचार विमर्श उनके साथ मत कीजिये क्योंकि आप पहले ही परख चुके है की वे सार्थक चर्चा में विश्वास नहीं रखते है। उन्हें स्पष्ट और विनम्र शब्दों में बता दीजिये की इस स्थिति को ठीक करने के लिए आप क्या करने वाले हैं। इसके आगे वे जो भी विष-वमन करेंगे वह उनका परिचय हैं आपका नहीं।

7. उनसे नफरत करना आपके अंदर विष ही भरता हैं –

एक कहावत हैं की ‘आँख के बदले आँख लेते रहने से एक दिन सारी दुनिया अंधी हो जाएगी’ इसलिए चाहे कैसा भी बर्ताव वे करते हो उन बातों को अपने दिल में जगह न दें। यदि समय पर आप अपने लिए खड़े नहीं हुए तो निश्चित रूप से ये घुटन, मजबूर होने का एहसास आपके मन में उनके लिए प्रगाढ़ नफरत भर देगी,  प्रेम और नफरत दोनों ही ऊर्जा के स्वरूप हैं और ऊर्जा किसी न किसी रूप में अपना मार्ग बनाती ही हैं। आपकी नफरत मज़बूरीवश जहाँ नहीं निकल पा रही वह कहीं और अपने लिए मार्ग बना ही लेगी। जाने अनजाने किसी और के जीवन में धीमा विष बन के न बह निकले ये ऊर्जा… खासतौर पर उनके जीवन में जिनका बचपन आपकी ऊर्जा से सींचा जा रहा हैं ! जिन्हे कल आप किसी परिवार को, समाज को सौंपने वाले हैं ! इसलिए, अपने लिए खड़े होने का साहस बटोरिये, अपनी बात कहिये, अपना ख्याल रखिये और मन को साफ़ रखिये क्योंकि इसे जीवन भर आपका रहना हैं।

8. समय के साथ लोग बदलते भी हैं परन्तु परखिये की इस इंतज़ार की कीमत अदा करने में आप सक्षम है या नहीं-

समय के साथ, उम्र के साथ, अनुभवों के साथ… धैर्य आने लगता हैं। बहुत बार ऐसे लोगों का ‘ह्रदय परिवर्तन’ होता भी हैं। एक बार टूटे भरोसे का फिर से जुड़ना इतना सरल तो नहीं होता पर फिर भी यदि दोनों पक्ष समझें तो ये हो भी जाता हैं। बहुत बार किसी और के साथ का कड़वा अनुभव उन्हें आपका महत्व, सच्चाई की परख करवा देता हैं। ये हो भी सकता है और नहीं भी। इसलिए इसका ये अर्थ नहीं की ऐसे किसी चमत्कार के इंतज़ार में आप स्वयं को मिटा डालें। सम्बन्ध का अर्थ ही हैं हैं “दो लोग”, एक अकेले की जिम्मेदारी नहीं है ये। अकेले के प्रयासों से आप सम्बन्ध को ढों तो सकते हैं जीवित नहीं रख सकतें।

कई बार ऐसे सम्बन्ध को विदा करना ही एकमात्र विकल्प होता हैं। आप उनके व्यवहार को किसी सूरत नियंत्रित नहीं कर सकते पर यदि इसके चलते इतनी गुंजाईश भी बाकि नहीं रह पा रही की आप आप अपने आप को बचा कर रख सकें तो याद रखिये ये जीवन आपका हैं और इस पर किसी भी और सम्बन्धी या समाज से पहले आपका अधिकार हैं।  आप लगातार अपने मन को छलनी करने का, आपके स्वाभिमान को छिन्न भिन्न करने का,आपके मानसिक संतुलन को हिला देने का, आपको मिटा देने का, अधिकार किसी को भी नहीं दे सकते हैं और इसे रोकने के लिए जो भी आवश्यक हो, आप कीजिये। इसके लिए आप किसी को उत्तरदायी नहीं हैं।

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