डिप्रेशन- रोग या सिर्फ मन का ख़याल

डिप्रेशन- रोग या सिर्फ मन का ख़याल

February 16, 2019 0 By Dr.Gunjarika Ranka

“अब अपने दिल पे मेरी हुकूमत नहीं रही

 सियासत से अपनी अब, ये इलाका भी चला गया…”

इश्क़?

जी नहीं ये डिप्रेशन भी हो सकता हैं !!

कितना जानते हैं आप डिप्रेशन को?

आप कहेंगे डिप्रेशन यानि..  हर वक़्त की उदासी, उतरा हुआ मुँह, थकान, मन नहीं लगना, नींद नहीं आना, या बहुत ज्यादा नींद आना… कुल मिला के डिप्रेशन मतलब “हर वक़्त दुखी रहना”

और क्यों होता हैं डिप्रेशन?

जिंदगी में कोई बड़ा दुःख आ जाये तो उसको झेलने से हो जाता हैं या कोई ऐसी समस्या जो हल न हो रही हो तो बहुत ज्यादा परेशान रहने से हो जाता हैं डिप्रेशन।

क्या करना चाहिए डिप्रेशन वालों को ?

खुश रहने की कोशिश करनी चाहिये, नकारात्मक बातों को दिमाग से निकाल देना चाहिए, अच्छी-अच्छी बातें पढ़नी चाहिए और क्या !

 


रोजमर्रा की परेशानियों से तंग आकर लोग बड़ी सहजता से कह देते हैं की हम तो बहुत “डिप्रेस” हो गए हैं। और फिर जब वो परेशानी ख़त्म हो जाती हैं तो वही लोग कहते हैं की मुझे भी बहुत “डिप्रेशन” हुआ था फिर सब ठीक कर लिया मैंने ! और इस तरह “डिप्रेशन” जैसी एक क्लीनिकल बीमारी को साधारण तनाव का पर्याय मान लिया जाता हैं। नतीजा यह की हमें कोई अंदाज़ा ही नहीं होता उन लोगों की गंभीर स्थिति का जो वास्तव में “डिप्रेशन” से जूझ रहे हैं।


 

आइये अब आपको वास्तविक यानि “Clinical Depression” से मिलवाते हैं !

  • डिप्रेशन का मतलब हमेशा उदास रहना नहीं होता।
  • ये तब भी हो सकता हैं जब आधी रात को नींद न आये, सुन्न सा महसूस हो।
  • ये तब भी होता हैं जब सुबह बिस्तर से उठने की हालत न हो जब की पिछला दिन सामान्य/अच्छा बीता हो।
  • कभी बिलकुल ना खाना और खाने की इच्छा भी न होना और कभी अत्यधिक खाना क्योंकि आप खुद को अनमना और अकेला अनुभव कर रहे हैं।
  • कभी बहुत प्रेम करना और कभी बिलकुल बेरुखी रखना।
  • गहरी निराशा/नाउम्मीदी (hopelessness) अनुभव करना।
  • स्वयं को व्यर्थ (worthless) समझना।
  • डिप्रेशन हर वक़्त उदास रहना नहीं हैं, उदासी हँसी के पीछे छुपी भी हो सकती हैं।
  • आप डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं तब भी, जब लोग ये कह रहे हो की आपको डिप्रेशन नहीं हैं क्योंकि आप तो हँसते भी हैं!

 

डिप्रेशन  के बारे में कुछ बहुत जरुरी बाते जो आपको जाननी चाहिए –

  • डिप्रेशन का सम्बन्ध किसी भावनात्मक परेशानी से हो भी सकता हैं और नहीं भी।
  • ये स्थिति (डिप्रेशन) हमारे दिमाग की रासायनिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं से सम्बंधित हैं।
  • वैसे ही जैसे आँखों के कमज़ोर होने का सम्बंध screen time (tv, phone, computer) ज़्यादा होने से हो सकता हैं पर ज़रूरी नहीं की सिर्फ़ इनकी वजह से ही आँखे कमज़ोर होती हैं।
  • और जैसे हम कमज़ोर आँखो वाले से यह नहीं कह सकते की “ठीक से देखने की कोशिश करो” वैसे ही डिप्रेशन भी एक क्लिनिकल बीमारी हैं इसलिए यह कहना की “ख़ुश रहने की कोशिश करो” कारगर साबित नहीं होता।
  • ख़ुश रहने का अहसास दरसल एक हार्मोन के स्रवण से होता हैं और इस क्लिनिकल अवस्था में वह हार्मोन असंतुलित हो जाता हैं इसलिए सिर्फ़ चाहने से वे ख़ुशी अनुभव नहीं कर पाते।

 

अगर आपको लगता हैं की डिप्रेस्ड व्यक्ति को  “सिर्फ खुशियों पर ध्यान दो” “सकारात्मक सोचो” जैसी सलाह दे कर आप उनकी कोई सहायता कर रहे हैं तो जान लीजिये की आप उनकी मुश्किलें और घुटन और भी बढ़ा रहे हैं क्योंकि वे अपनी समस्या से तो जूझ ही रहे हैं साथ ही उन्हें यह भी सुनना पड़ रहा हैं की ये सब जो उन्हें लग रहा हैं वह वास्तव में “कुछ हैं ही नहीं” ! ये सब तो “बस उन्हीं के मन में हैं”

कह के देखिये किसी कमजोर आँखों वाले से की “ये जो उसे साफ़ नहीं दिख रहा हैं न ये तो बस उसके मन में ही हैं वह अगर सकारात्मक सोचेगा तो उसे सब दिखने लगेगा” कह सकेंगे आप? और सोचिये की कैसी घुटन और आक्रोश भर जायेगा उस व्यक्ति में जिसे एक तो साफ़ नहीं दिख रहा ऊपर से लोग कह रहे हैं की ये तो choice हैं की वह साफ़ देखना चाहता हैं या धुंधला। बिलकुल ऐसी ही मनोदशा होती हैं उस डिप्रेशन के मरीज की जिसे आप कहते हैं की “happiness is a choice”

हाँ, ख़ुशी “चॉइस” हैं पर समझिये की हमारे दिमाग के लिए ये सिर्फ एक हार्मोन हैं…‘एक रसायन’ बस! और डिप्रेशन यानि उस रसायन का बनना और स्त्रावित होना असंतुलित हो गया हैं।

आपकी गाड़ी के स्टीयरिंग को किधर घुमाना हैं यह आपकी “चॉइस” तभी तक हैं जब तक आपकी गाड़ी की सारी मशीनरी सही काम कर रही हैं !  पर अगर कहीं कुछ गड़बड़ हुई तो वह बीच सड़क में खड़ी हो जाएगी और अब कोई कहे आपसे की गाड़ी में कुछ भी खराबी हो आखिर स्टीयरिंग तो तुम्हारे ही हाथ में हैं…ले चलो इसे जिधर ले जाना चाहो !  ले जा सकेंगे आप? नहीं न।

वाकई में उनकी सहायता करने के लिए आपको उन्हें रोज WhatsApp पर पॉजिटिव quotes भेजने की जरुरत नहीं हैं बल्कि जरुरत हैं की आप उन्हें पूछे की क्या वे मनोचिकित्सक से मिलें हैं। अगर नहीं तो उन्हें प्रेरित कीजिये की वे मिलें। उन्हें अपना पहला appointment लेने में उनकी सहायता कीजिये क्योंकि हो सकता हैं की उनको झिझक मह्सूस हो रही हो। उनकी दिक्कतों को वास्तविक (सच) समझिये, उन्हें सिर्फ उनके “दिमाग का खलल” मत कहिये।

और एक बात, हो सकता हैं की बाहर जाने से, लोगों से घुलने मिलने से कुछ लोग थोड़े समय के लिए अच्छा महसूस करें पर ऐसा हर बार होगा ही ये जरुरी नहीं हैं। कई बार इस रिलैक्स करने वाले हार्मोन का स्त्रवण बहुत कम हो जाता हैं और ऐसे में डिप्रेशन बहुत हावी हो जाता हैं, इसलिए कभी वे लोगों से मिल कर अच्छा महसूस करते हैं और कभी वे किसी से भी मिलना नहीं चाहते। ये उनका दोष नहीं हैं और इसे उनकी मनमर्जी और सबसे बुरी बात “नाटकबाजी” तो हरगिज न समझें।

ऐसा वक़्त, जब उनके लिए सब कुछ बहुत भारी हो रहा हो तो उन्हें ये मत कहिये की “अच्छा सोचने की कोशिश करों” बल्कि कहिये की “मैं समझ सकती हूँ आपको कैसा लग रहा हैं… मैं  आपकी कैसे सहायता कर सकती हूँ… ये सब ठीक हो जायेगा।

उस मुश्किल वक़्त में अगर उनके किन्हीं छोटे मोटे पर महत्वपूर्ण दायित्वों को निभाने में आप सहायता कर सकते हैं तो कीजिये। 

यदि आप या आपका कोई अपना ऊपर बताये गए लक्षणों को महसूस कर रहा हैं और ये लक्षण इतने बढ़ गए हैं की आपकी दिनचर्या प्रभावित होने लगी हैं तो आप मनोचिकित्सक से अवश्य मिलिए। दिमाग़ भी हमारे शरीर का एक ‘अंग’ ही हैं वैसे ही जैसे आँख, कान, किडनी, लिवर और बाक़ी सारे organs हैं। इसलिए जिस सहजता से आप आँखो के डॉक्टर के पास चले जाते हैं उतनी ही सहजता से मनोचिकित्सक के पास भी जाइए।

डिप्रेशन एक पल में घटने वाली घटना नहीं हैं। ये अपनी जड़ें धीरे धीरे जमाता हैं। इस से पहले कि तनाव इतना अधिक बढ़ जाये की दिमाग की वायरिंग को गहरा नुकसान पहुंचाएं और दवाओं की नौबत आये, समय रहते अपनी दिनचर्या में कुछ जरुरी बदलाव ला कर इस स्थिति से बचा जा सकता हैं। वे बदलाव क्या हैं इस पर अगले आलेख में चर्चा करेंगें।

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