उलझ न जाये रिश्तों की डोर!

उलझ न जाये रिश्तों की डोर!

January 3, 2019 0 By Dr.Gunjarika Ranka

मम्मी, आस्था की तबियत ठीक नहीं हैं लाइए मैं आपकी मदद कर देता हूँ। अनुज ने जैसे ही रसोई में आ कर कहा उसकी माँ कान्ता फट पड़ी। “जब से आयी हैं हम ही इसकी सेवा में लगे हुए हैं। क्या इसीलिए ब्याह कर लाये थे इसे की अपनी बूढ़ी हडियों को और घिसवाते रहें। हुँह !” अनुज ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप रसोई के कामों में हाथ बँटाता रहा। उसे याद आ रहा था की कैसे उसके ब्याह के लिए माँ बहुत उत्साहित थी। सब तरह से देख-परख कर चुना था उन्होंने आस्था को अपने लाडले बेटे के लिए। शादी से पहले कैसे सबको गर्व से अपनी होने वाली बहु की तस्वीर दिखाती थी और उसके गुणों का बखान करती नहीं थकती थी। अनुज को भी तो पहली नज़र में ही भा गयी थी आस्था।

ब्याह के २ माह में ही आस्था गर्भवती हो गयी थी। अभी तो आस्था बहु और पत्नी की इस नयी भूमिका को समझने की कोशिश कर रही थी और इतनी जल्दी ये नयी जिम्मेदारी ! कई दिनों से तबियत ठीक नहीं रहती थी उल्टियों के कारण कमजोरी तो आ ही रखी थी और अब वायरल बुखार ने रही सही कसर भी पूरी कर दी। ऐसे में डॉक्टर एंटीबायोटिक भी नहीं देते है तो उसे अपने खाने पीने का ख़याल रखने और पूरा विश्राम करने की हिदायत दे दी थी डॉक्टर ने। अनुज ने माँ को बताया तो था सब पर पता नहीं क्यूँ वो इतना नाराज़ हो रही हैं। अनुज आस्था के लिए नाश्ता कमरे में ही ले गया। उसे खिलाया और आराम करने को कहा। आज ऑफिस में जरूरी मीटिंग थी उसका जाना जरूरी था। अनुज को इस तरह नाश्ता कमरे में ले जाते देख कान्ता जी के गुस्से का ठिकाना नहीं था। बेटे के जाते ही वे बरस पड़ीं आस्था पर “देखो आस्था ये सब ड्रामेबाजी से तुम मेरे बेटे को बेवकूफ बना सकती हो मुझे नहीं। तीसरे महीने में ही बिस्तर पकड़ लिया हैं तुमने अरे हमने तो नौवे महीने में भी सारे घर का काम किया हैं। ऐसे जरा से बुखार का तो हम घर में जिक्र भी नहीं करते थे जिसके पीछे तुमने आज नाश्ता तक अनुज से बनवा लिया ! ये ढर्रे यहाँ नहीं चलेंगे समझी।

गुस्से से दनदनाती कान्ता जी कमरे से चली गयी और पीछे थी आँखों में दर्द…  आश्चर्य से उन्हें देखती हुये आस्था। ये कैसे बात कर रही हैं मम्मीजी ! अभी यहाँ मम्मी होती तो मेरा सर दबाती मुझे पूछती की अब जी तो नहीं घबरा रहा…. पर मम्मी नहीं मम्मीजी है यहाँ… इतनी कठोर ! आस्था रो पड़ी। जब से आयी हैं उसने पाया हैं की मम्मीजी को उसका घर के कामों में लगे रहना ही पसंद हैं। कभी अगर वह दिन का काम निपटा कर कमरे में जाए तो मम्मी जी कोई न काम निकाल ही लेती थी कभी रसोई के सारे डिब्बे निकल कर धोने बैठ जाती तो कभी सारे परदे निकाल कर रोशनदान को झाड़ना शुरू कर देती। तो कभी बेड ख़ाली करती की सारे कपड़े, गद्दे वगैरह को छत पर धूप दिखाने के लिए रखो। ये सब करते हुए वे नाराजगी दिखाती रहती की कैसे आस्था के आने के बाद घर अब “पहले जैसा साफ़ सुथरा” नहीं रहता हैं। आस्था यूँ भी उनसे घबराई हुई सी ही रहती थी और अब ऐसी हालत में उनका रौद्र रूप देख कर वो और भी डर गयी थी। रोते-रोते उसे कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। दोपहर को आंख खुली। उसने बेड से उतरना चाहा तो तेज चक्कर आ गया। वो वहीँ बैठ गयी। रसोई से बर्तनों के साथ-साथ कान्ता जी के बड़बड़ाने की भी आवाज़े आ रही थी, “अब महारानी लम्बी तान कर पड़ी हैं.. हम तो नौकर लगे है जो थाल सजा-सजा कर देंगे इनको। मेरे ही भाग में लिखा था जिंदगी भर बस पचते रहो.. मुझसे नहीं होगी ये चाकरी कहे देती हूँ ” शरीर से ज्यादा मन टूट रहा था आस्था का… क्या करे वो अब..  पेट से भूख के कारण गुड़-गुड़ आवाजे आ रही थी, सुबह-सुबह उल्टियों के कारण जी अच्छा नहीं था तो नाश्ता ठीक से किया ही नहीं था पर अब ? अब क्या करें! उसे इस हालत में भूखा भी तो नहीं रहना चाहिए। तभी अनुज का फ़ोन आ गया “आस्था कैसी तबियत है अब? खाना खाया तुमने?”

आस्था की आँखों में आंसू आ गए.. गला भर आया कुछ बोल ही नहीं पायी। 10 सेकेंड्स की चुप्पी ने अनुज को सब समझा दिया घर में क्या चल रहा हैं। तुम परेशान मत होना आस्था में अभी 15-20 मिनट में पहुँच रहा हूँ घर। और 15 मिनट में अनुज घर पर था। बेटे को असमय घर आया देख कांता जी और झल्ला गयी की लो अब फ़ोन कर के बुला लिया तुझे और तू भी दौड़ा चला आया! वाह रे मेरे लाल! अनुज ने कातर नज़रों से माँ को देखा और सीधे रसोई की ओर गया। दलिया निकाल कर गैस पर चढ़ाया और कमरे में गया। “सॉरी आस्था मेने सोचा नहीं था की तुम्हारे साथ मेरे घर में ऐसा व्यवहार होगा मुझे खुद हैरानी हैं मम्मी का ये कौनसा रूप हैं ! वो ऐसा क्यों कर रही हैं पर तुम चिंता मत करों मैं आज ही उनसे बात करूँगा।

आस्था को दलिया खिला कर अनुज मम्मी के कमरे में गया। अनुज के पापा आराम कुर्सी पैर बैठे अख़बार देख रहे थे और बेड पर तकिये का सहारा लिए कान्ता जी दीवार से सर टिकाये आंखे बंद किये बैठी थी। अनुज वही नीचे बैठ गया और कान्ता जी की गोद में सर रख दिया। कान्ता जी चौंक गयी, “अनुज! क्या हुआ ?” “वही पूछ रहा हूँ मम्मी क्या हुआ ?” कान्ता जी तैश में आ गयी “मेने क्या किया हैं! मुझसे सवाल-जवाब करने को भेजा है उसने तुझे ! कल की आयी के लिए माँ से लड़ने आया है तू !!”  अनुज शांति से उनको सुनता रहा फिर बोला “नहीं माँ ! मैं ‘अपनी माँ’ की उलझन जानने आया हूँ ताकि कल की आयी को समझा सकूँ।बताओ न माँ क्यों परेशां हो आप इतनी…  माँ का हाथ अपने हाथो में लेते हुए अनुज ने कहा। बेटे का स्नेहिल स्पर्श पा कर कान्ता जी की ऑंखें भर आयी। बोली, “अनुज बहु को बहु के रूप में देखना चाहती हूँ बस ! मैं जिस दिन से इस घर में ब्याह कर आयी थी तेरी दादी ने जैसे कहा, वैसे मैंने किया। उन्होंने जैसे रखा, मैं वैसे रही। घर के कामों के आगे न दिन देखा न रात। न कभी अपनी तबियत ख़राब का नाम भी लिया किसी के आगे। तेरी दादी बहुत सख्त और गुस्से वाली थी। जरा सी देर भी हो जाती काम पूरा होने में तो भी जी काँपता था मेरा की जाने क्या होगा अब। तू होने वाला था न तो पूरे नौ महीने घर का सारा काम किया है मेने कोई सहारा देने वाला नहीं था। और मजाल हैं जो तेरे पापा ने माँ के आगे मेरे लिए कुछ भी किया हो तो ! और तू ऐसे मेरे आगे से थाल सजा कर ले जाता है अपनी बीवी के लिए !! पहले सास ने मुझे इंसान नहीं समझा और अब बहु अपनी सेवा में मुझे लगा रही हैं ! मेरा तो कोई हैं ही नहीं इस घर में ! अनुज ने पापा की और देखा उनका मौन साक्षी था माँ के साथ हुए हर दुर्व्यवहार का।

“अच्छा मम्मी आपको याद हैं जब इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन हुआ था मेरा और दूसरे शहर गया था मैं हॉस्टल में। बात का विषय यूँ बदलना कान्ता जी को समझ नहीं आया पर बोली हाँ याद हैं मुझे अनुज।और याद हैं आपको जब चार दिन बाद ही मैंने आपको फ़ोन किया था और रात की ही बस पकड़ कर दिल्ली चले आये थे आप पापा के साथ ! हाँ बेटा याद हैं मुझे ! कितना परेशान.. कितना डरा हुआ था तू ! रैगिंग हो रही थी हॉस्टल में नए आये लड़कों की। घबरा कर तू कॉलेज ही छोड़ देना चाहता था। कितनी मेहनत की थी तूने उस कॉलेज में एडमिशन के लिए भला ऐसे कैसे तेरी मेहनत पर पानी फिरने देती मैं। वो सीनियर लड़के जो अपने मजे के लिए तुम लोगों के साथ गन्दा व्यवहार कर रहे थे। हाँ माँ और याद हैं कैसे आपने उनकी क्लास लगा दी थी ! “और क्या करती तो !” कान्ता जी अब जोश में आ गयी थी। भला ये भी कोई बात हुई उनकी की “आंटी जी हमने भी तो रेग्गिंग दी थी तो अब लेंगे क्यों नहीं हम भी लेंगे ! तो क्या रेग्गिंग मेरे अनुज ने ली थी जो इस से बदला लोगे ? और ऐसे तो गलत चीजे कभी रुकेंगी ही नहीं ! कल तुम्हारे साथ गलत हुआ आज तुम नए बच्चों के साथ करोगे फिर आगे ये अपने आगे वालो के साथ करेंगे … ये तो बेवकूफी…बोलते बोलते अचानक रुक गयी कान्ता जी !

भरपूर नज़रों से बेटे को देखा जो आँखों में ढेर सारी इज़्ज़त और प्यार लिए माँ को देख रहा था। “ओह ! तो ऐसे मुझे अपनी बातों में फंसाया हैं तूने” “फंसाया नहीं हैं माँ, उस दिन मेरी बहादुर माँ ने अपने एक बच्चे को रेग्गिंग के इस चक्र से मुक्त करवाया था, आज अपनी एक बच्ची को ऐसे ही चक्र में जाने से बचा लो। कान्ता जी हैरान सी बेटे का मुँह देख रही थी। तो तू मुझे दोष ही दे रहा है न अनुज? नहीं माँ मैं आपको दोष नहीं दे रहा पर मैं नहीं चाहता की जैसे आज आप मुझे दादी के दुर्व्यवहार के बारे में बता रहे हो और पापा चुपचाप सुन रहे हैं ऐसे ही कल आस्था मेरे बच्चो को आपके लिए कहे और मैं इस तरह सर झुकाये बैठा रहू। मैं आपके साथ हूँ माँ…हमेशा रहूँगा और मैं चाहता हूँ की हमारे होते आस्था को भी कभी ये न कहना पड़े की “मेरा कोई नहीं इस घर में !” आप मेरे साथ हो न माँ ? कान्ता जी ने बेटे के हाथ को अपने दोनों हाथों से थाम लिया। माँ-बेटे दोनों की ऑंखें नम थी विश्वास और प्रेम की झिलमिलाहट लिए…!

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